महाविद्यालय का परिचय

डायट टीकापट्टी कटिहार कुर्शेला रेलवे स्टेशन से 15 किलोमीटर दूर एवं NH-31 पे स्थित है| शिक्षा (एनपीई) 1986 और एक्शन (पीओए) पर राष्ट्रीय शिक्षा नीति विशेष रूप से जिला में शिक्षक सशक्तिकरण कार्यक्रमों की शैक्षिक नियोजन में शैक्षणिक कार्य का समर्थन करने केलिए एक तिसरे स्तर (जिला स्तर) संस्था की परिकल्पना की गई.जो आज के समय मे शिक्षा और प्रशिक्षण के जिला संस्थान (डायट) के नाम से जाना जा राहा है। शिक्षक की तैयारी की प्रक्रिया कुछ खास तरह कि ज्ञान और कौशलों में दक्षता की मांग करती है ।

अध्यापक- शिक्षा के पाठ्यक्रम का आधार

इस पाठ्यचर्या के निर्माण में कुछ बुनियादी बातों का ध्यान रखा गया है:-
       • गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए बच्चे का संवैधानिक अधिकार।
       • पिछले दो दशकों से बिहार में बनी नयी सामाजिक-सांस्कृतिक व शैक्षिक स्थिति
       • संवैधानिक बाध्यता (समाजवाद व धर्म निरपेक्षता)
उपरोक्त चर्चा के मद्देनजर ऐसे शिक्षकों एंव शिक्षिकाओं की जरूरत महसूस होती है जिनमें समाज व दुनिया के प्रति समीक्षात्मक समझ हो तथा जो शिक्षायी जड़ता से मुकाबला कर सकें और विकल्प को खोज सकें। इस क्रम में यह जरूरी है कि शिक्षक, बच्चों और उनकी दुनिया को गहरे तौर से समझें व उसमें रूचि ले सकें।
       इस तरह के शिक्षक की तैयारी की प्रक्रिया कुछ खास तरह कि ज्ञान और कौशलों में दक्षता की मांग करती है। इनका जिक्र नीचे क्रम से किया गया है:-

  1. शिक्षा के सम्बन्ध में बुनियादी विचारों की जानकारी एवं दुनिया भर में चल रहे शिक्षायी विमर्श की जानकारी शिक्षक को उसकी अकादमिक परिस्थितियों से जूझने में मदद पहुँचाती है। इसलिए एक शिक्षक की तैयारी के क्रम में उसे बुनियादी दार्शनिक, सामाजिक व शिक्षायी विचारों की जानकारी दी जानी चाहिए। साथ ही उसे दुनिया के विभिन्न हिस्सों में चल रहे शिक्षायी नवाचारों की भी जानकारी होनी चाहिए। यह समझ शिक्षक को नई चुनौतियों का सामना करने के लिए तो तैयार करती ही है साथ ही उसे ‘विकल्प’ तलाशने के लिए भी प्रेरित करती है।
  2. अध्यापक-शिक्षा का एक अनिवार्य अंग है बच्चों को समझना (उनके विकास व सीखने की प्रक्रिया के साथ) इस क्रम में बच्चों के विभिन्न पहलुओं जैसे मानसिक, सामाजिक, नैतिक व शारीरिक विकास को समझने के क्रम में हमें विभिन्न मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों को भी समझना होगा ।..............